बुधवार, 20 जनवरी 2010

इशु की गाथा

क्षमा करें ............ बहुत समय पश्चात आप लोगों के समक्ष उपस्थित हो पाया हूँ । क्या कहूँ कार्यालय में इतनी व्यस्तता थी कि नए लेख के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा था , और मेरे विचार से हमे या तो ब्लॉग में अच्छे लेख प्रस्तुत करने चाहिए अन्यथा नहीं और अच्छे लेख समयाभाव में नहीं लिखे जा सकते । यही कारण है की आप लोगों के समक्ष उपस्थित होने में एक लम्बा समय अंतराल रहा, मै क्षमाप्राथी हूँ।
आज मै अपने इस नए लेख में आप लोगों के समक्ष प्रभु इसु की विजय गाथा प्रस्तुत करने जा रहा हूँ तथा उम्मीद करता हूँ की यह लेखा आप लोगों को अवश्य पसंद आये । माना जाता है कि ईसा का जन्म इस्राइल के प्रान्त के एक गाँव बैतलहम में बहुत कठिन परिस्थितियों में हुआ था । उनकी माता मारिया (मरियम) उनके जन्म के समय कुमारी थीं (नाम-मात्र के लिये उनकी युसुफ़ से शादी हो गयी थी) । बाइबिल के मुताबिक मारिया को ईश्वर द्वारा सन्देश मिला था कि उनके गर्भ से ईश्वरपुत्र जन्म लेगा । यहूदी धर्मगुरुओ ने सदियों पहले एक उद्धारक या मुक्तिदाता (मसीहा) के आने की भविष्यवाणी की (जो इसा थे )। ईसा और उनका परिवार जन्मजात यहूदी थे । पौने दो हजार साल पहले की बात है। फिलिस्तीन में उन दिनों हिरोद का राज था। इसी दौरान यूसुफ नाम का यहूदी बढ़ई नज़रथ नगर से बैतलहम के लिए रवाना हुआ। वहीं पर उसकी पत्नी मरियम के गर्भ से ईसा का जन्म हुआ। संयोग ऐसा था कि उस समय इन बेचारों को किसी धर्मशाला में भी ठिकाना न मिल सका। इस लाचार बच्चे को कपड़ों में लपेटकर चरनी (पशुओं की नाद) में रख दिया गया। आठवें दिन बच्चे का नाम रखा गया, यीसु या ईसा। उन दिनों ऐसी प्रथा थी कि माता-पिता बड़े बेटे को ईश्वर को अर्पित कर देते थे। इन लोगों ने भी इसी तरह ईसा को अर्पित कर दिया। ईसा दिन-दिन बड़े हो जब बारह वर्ष के हुए, तो यरूशलम में दो दिन रुककर पुजारियों से ज्ञान चर्चा करते रहे। सत्य को खोजने की वृत्ति उनमें बचपन से ही थी।
ईसा जब 30 साल के हुए, तो एक दिन किसी से उन्होंने सुना कि पास के जंगल में जॉर्डन नदी के किनारे एक महात्मा रहते हैं। उनका नाम है, यूहन्ना (जॉन)। बहुत से लोग उनका उपदेश सुनने जाते थे। ईसा को भी उत्सुकता हुई। वे भी यूहन्ना का उपदेश सुनने के लिए निकल पड़े।ईसा को यूहन्ना की बातें बहुत जँचीं। उन्होंने यूहन्ना से दीक्षा ले ली। उनकी बातों पर गहरा विचार करने के लिए वे घर लौटने के बजाय जंगल में ही रह गए। यूहन्ना की बातों पर ईसा ने गहराई से चिंतन और मनन किया और अंत में निश्चय किया कि हमें प्रभु की इच्छा के अनुसार प्रभु की सेवा करनी चाहिए।इसके बाद प्रभु ईसा जगह-जगह प्रवचन करने लगे। वे लोगों से कहते, प्रभु का राज्य कहीं दूर नहीं है वह हमारे भीतर ही है। हमारी आत्मा के ही भीतर है। हमें ही उसकी स्थापना करनी होगी। हम अपने आपको बदलकर, अपने में परिवर्तन करके प्रभु का राज्य ला सकते हैं। ईसा की प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी , ईसा ने कई चमत्कार भी किये ।वह कहते थे 'पैसे वालों का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं हो सकता। सूई के छेद से ऊँट भले निकल जाए, धनवान व्यक्ति प्रभु के राज्य में नहीं पहुँच सकता। अपनी सारी दौलत गरीबों में बाँटकर, मेरे साथ आओ।
ऐसी बातें सुनकर पैसे वाले लोग ईसा के विरोधी बन गए। पुरानी गलत प्रथाओं का भी ईसा ने विरोध किया। सत्य के लिए वे किसी की परवाह नहीं करते थे। नतीजा यह हुआ कि दिन-दिन उनका विरोध बढ़ने लगा।सन्‌ 29 ई। के लगभग प्रभु ईसा यरुशलम पहुँचे। वही उनको पकड़ने और दंडित करने का षड्यंत्र रचा गया।यहूदियों के कट्टरपन्थी रब्बियों (धर्मगुरुओं) ने ईसा का भारी विरोध किया । उन्हें ईसा में मसीहा जैसा कुछ ख़ास नहीं लगा । उन्हें अपने कर्मकाण्डों से प्रेम था । ख़ुद को ईश्वरपुत्र बताना उनके लिये भारी पाप था । इसलिये उन्होंने उस वक़्त के रोमन गवर्नर पिलातुस को इसकी शिकायत कर दी । रोमनों को हमेशा यहूदी क्रान्ति का डर रहता था । इसलिये कट्टरपन्थियों को प्रसन्न करने के लिये पिलातुस ने ईसा को क्रूस (सलीब) पर मृत्युदण्ड की दर्दनाक सज़ा सुनाई । ईसाइयों का मानना है कि क्रूस पर मरते समय ईसा मसीह ने सभी इंसानों के पाप स्वयं पर ले लिये थे और इसलिये जो भी ईसा में विश्वास करेगा, उसे ही स्वर्ग मिलेगा। ईसा के 12 शिष्यों ने उनके नये धर्म को सभी जगह फैलाया । यही धर्म ईसाई धर्म कहलाया ।

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