अपने पहले लेख में मैंने अपने जीवन के उस पल का वर्णन किया था जिसने मुझे मेरे जीवन का लक्ष्य दियायदि आपने फ़िल्म "ॐ शान्ति ॐ" देखी होगी तो आपको नायक शाहरुख खान के द्बारा कहे गए ये वाक्य तो याद ही होंगे कि "यदि कोई इंसान सच्चे मन और लगन से कुछ पाने की ख्वाहिश करता हैं तो सारी कायनात उसे उसकी ख्वाहिश से मिलाने की जद्दोजहत में जुट जाती है" | मेरे ब्लॉग विजयीभव का उद्देश्य यही है कि हम इस ब्लॉग उन विजयगाथाओं पर चर्चा कर सके जो निश्चित रूप से इंसान के दृढ़ निश्चय,आत्म विश्वास, सकारात्मक सोच और जीत की उम्मीद के परिणाम हों |
इसी क्रम में अपने इस लेख मै आज आप लोगों का परिचय कथाकार इसप के विजयगाथा से कराना चाहूँगा जिन्हें अपनी विजय मरणोपरांत प्राप्त हुई ...........................................
आज ईसप की कहानियाँ संसार के हर देश में पढ़ी और सुनी जाती हैं। लोग बहुत आदर से बाबा ईसप को याद करते हैं। संसार के बड़े-से बड़े लेखक और कलावंत भी उनके सम्मान में सिर झुकाते हैं, इसलिए कि बाबा ईसप की कथाओं में जादू है। ये वे कथाएँ हैं जो बच्चों और बड़ों, सभी को लुभाती हैं। शायद ही कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो, जिसने बाबा ईसप की कोई दिलचस्प कथा न पढ़ी हो। ये कथाएँ बेहद लोकप्रिय हैं, पर इनकी लोकप्रियता के पीछे यह बात भी छिपी हुई है कि इनके पीछे सच्चाई की ताकत है। ये कहानियाँ हमें खुली आँखों से दुनिया को देखने और निर्भयता से जीने की सीख देती हैं, साथ ही अन्याय का विरोध करना भी सिखाती है। इसीलिए दुनिया भर में बाबा ईसप की कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।लेकिन इन कथाओं को बुननेवाले बाबा ईसप का जीवन भी खुद एक कहानी है-बड़ी ही दर्दनाक कहानी। उनका जन्म करीब ढाई हजार साल पहले यूनान में हुआ था। तब यूनान में दास-प्रथा का जोर था। मनुष्यों को दास बनाकर बाजारों में बेचा जाता था, जैसे गाय-बैल और गधे बिकते हैं। धनवान लोग थोड़ा-सा धन देकर उन्हें खरीद ले जाते थे और उनसे मन चाहे काम कराते थे। उन्हें बुरी तरह सताया जाता था। उन पर ऐसे अत्याचार होते थे कि उनके बारे में जानकार रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें घो़ड़ों की तरह गाड़ियों में जोता जाता था। अगर वे तेज न चल पाते तो पीठ पर कोड़ों की बरसात होती थी।इसी तरह बाजार में बिकनेवाला एक दास ईसप भी था। ईसप तब नवयुवक ही था और उसके भीतर स्वाभिमान व आजादी की आँधी मचल रही थी। उसने अपनी ही तरह जोशीले और ताकतवर उन दासों को इकट्ठा कर किया, जो गुलामी से घृणा करते थे। सबने मिलकर एक मजबूत दल बना लिया और विद्रोह कर दिया। आसमान उनके जोशीले नारों से गूँजने लगा। वे आवेग से भरकर कह रहे थे-‘‘आखिर हम भी इनसान हैं, हम पर ये अत्याचार किसलिए ? हमारे पास भी दो हाथ-पैर हैं। हमारे मन में भी उमंगें हैं। हम जो चाहें, वह कर सकते हैं। हम कुत्तों की मौत मरने के लिए हरगिज तैयार नहीं। हम अत्याचार नहीं सहेंगे और अपना अधिकार प्राप्त करके रहेंगे।’’इन जोशीले नारों से धनी लोगों की नींद उड़ गई। भला वे यह बात कैसे स्वीकार कर सकते थे कि दास लोग खुल्लम-खुल्ला विद्रोह कर दें और अपनी आजादी की माँग करने लगे। उन्हें यह भी पता था कि ईसप ही उनका नेता है। आखिर सब धनवानों ने मिलकर ईसप को कैद कर लिया। उसे भयानक यातनाएँ दी गई। गरम लोहे से उसके पूरे शरीर को दागा गया। लेकिन ईसप शांत था। वह चुपचाप होठ भीचें अत्याचारों को सह रहा था। उसका मन कह रहा था कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया। आखिर हर आदमी को जिसने इस धरती पर जन्म लिया है, आजादी से जीने का हक है।तरह-तरह से सताने और मारने-पीटने के बाद ईसप को अब एक अँधेरी काल-कोठरी में डाल दिया गया, जहाँ धूप, हवा, रोशनी तक उसके पास नहीं आ सकती थी। वह मन-ही-मन घुटता रहता था। पिंजरे में डाले गए शेर की तरह मन-ही-मन छटपटाता रहता था। जमीन पर सिर पटक-पटककर बेहोश हो जाता।इसी तरह एक-एक कर कितने ही साल गुजर गए। ईसप को अब साल, महीने तो क्या याद रहते ! वह तो दिन और रात का अंतर करना ही भूल गया, क्योंकि उसकी अँधेरी कोठरी में तो हमेशा रात ही रहती थी। न उसे गरमी, जाड़े, बरसात का पता चलता था और न मौसम के बदलने का। धीरे-धीरे इतने साल गुजर गए कि ईसप बूढ़ा हो गया। यहाँ तक कि उसके घर के लोग भी उसे भूल गए।धनी लोगों ने जब देखा कि ईसप अब दीन-हीन बूढ़ा और लाचार हो गया है तो उन्होंने दया करके उसे काल-कोठरी से मुक्त कर दिया।ईसप जब काल कोठरी से बाहर आया तो बहुत कमजोर हो चुका था। यह अंदाज लगा पाना ही मुश्किल था कि इस आदमी में कभी इतनी ताकत थी कि इसने दासों में विद्रोह की भावना पैदा कर दी थी और धनी व शक्तिशाली लोग इसके कारण थर-थर कांपते थे। लेकिन अब ईसप की कमर झुककर तीर-कमान हो गई थी। आँखों से कुछ दिखाई नहीं देता था। कान बहरे हो गए थे। सिर पर उलझी जटाएँ थीं। दाढ़ी सफेद हो चुकी थी।ईसप के साथी ही अब उसे देखकर दूर भाग जाते थे। उन्हें डर था कि ईसप के साथ देख लिए जाने पर अब भी धनवान लोग उन पर अत्याचार करेंगे। इसलिए ईसप अब भीख माँगने को मजबूर हो गया। वह घर-घर जाता, बच्चों को दुआएँ देता, आशीर्वाद देता और भीख माँगता। कभी-कभी वह कहानियाँ भी सुनाया करता था। इसलिए बच्चे उसे देखकर दूर से दौड़े चले आते थे। दूर से ही चिल्लाकर कहते-‘‘बाबा, कहानी सुनाओ, कोई नई कहानी !’’ईसप उन्हें नई-से-नई कहानियाँ गढ़कर सुनाया करता। वे कहानियाँ ऐसी थीं जिन्हें सुनकर बच्चे खो जाया करते थे। जिन्हें सुनकर कभी वे रोते, कभी हँसते और कभी गुस्से से भर जाया करते थे, क्योंकि ये कहानियाँ उन्हें अन्याय का विरोध करना सिखाती थीं। इनमें जीवन के बड़े-बड़े सत्य छिपे थे। बाबा ईसप ने मानो अपने सारे जीवन के अनुभवों का सार इनमें निचोड़कर रख दिया था। इसीलिए इन कहानियों का असर बिलकुल जादू जैसा होता था। जो एक बार सुन लेता, वह इन कहानियों को कभी भूल ही न पाता।इसलिए बाबा ईसप द्वारा बच्चों को सुनाई गई ये कहानियाँ देखते-ही देखते घर-घर में फैलती चली गईं। पूरे यूनान में उनकी गूँज सुनाई देने लगी और फिर ये धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल गई। इन कहानियों में पशु-पक्षियों के जरिए बातें कही गई हैं; पर वे बातें इतनी बड़ी हैं कि जो भी सुनता है, देर तक सोचता ही रह जाता है। इसीलिए इन कहानियों का असर बहुत गहरा होता है।सच तो यह है कि ईसप अपने जीते-जी विद्रोह नहीं कर पाये , वह विद्रोह और परिवर्तन इन कहानियों के जरिए आया। देखते-ही-देखते समाज बदला। अब दास-प्रथा कहीं नहीं है। हाँ, ईसप की कहानियाँ आज भी हैं और वे हजारों सालों तक बनी रहेंगी, क्योंकि वे हमें एक सुंदर दुनिया गढ़ने की सीख देती हैं।
आज ईसप की कहानियाँ संसार के हर देश में पढ़ी और सुनी जाती हैं। लोग बहुत आदर से बाबा ईसप को याद करते हैं। संसार के बड़े-से बड़े लेखक और कलावंत भी उनके सम्मान में सिर झुकाते हैं, इसलिए कि बाबा ईसप की कथाओं में जादू है। ये वे कथाएँ हैं जो बच्चों और बड़ों, सभी को लुभाती हैं। शायद ही कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो, जिसने बाबा ईसप की कोई दिलचस्प कथा न पढ़ी हो। ये कथाएँ बेहद लोकप्रिय हैं, पर इनकी लोकप्रियता के पीछे यह बात भी छिपी हुई है कि इनके पीछे सच्चाई की ताकत है। ये कहानियाँ हमें खुली आँखों से दुनिया को देखने और निर्भयता से जीने की सीख देती हैं, साथ ही अन्याय का विरोध करना भी सिखाती है। इसीलिए दुनिया भर में बाबा ईसप की कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।लेकिन इन कथाओं को बुननेवाले बाबा ईसप का जीवन भी खुद एक कहानी है-बड़ी ही दर्दनाक कहानी। उनका जन्म करीब ढाई हजार साल पहले यूनान में हुआ था। तब यूनान में दास-प्रथा का जोर था। मनुष्यों को दास बनाकर बाजारों में बेचा जाता था, जैसे गाय-बैल और गधे बिकते हैं। धनवान लोग थोड़ा-सा धन देकर उन्हें खरीद ले जाते थे और उनसे मन चाहे काम कराते थे। उन्हें बुरी तरह सताया जाता था। उन पर ऐसे अत्याचार होते थे कि उनके बारे में जानकार रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें घो़ड़ों की तरह गाड़ियों में जोता जाता था। अगर वे तेज न चल पाते तो पीठ पर कोड़ों की बरसात होती थी।इसी तरह बाजार में बिकनेवाला एक दास ईसप भी था। ईसप तब नवयुवक ही था और उसके भीतर स्वाभिमान व आजादी की आँधी मचल रही थी। उसने अपनी ही तरह जोशीले और ताकतवर उन दासों को इकट्ठा कर किया, जो गुलामी से घृणा करते थे। सबने मिलकर एक मजबूत दल बना लिया और विद्रोह कर दिया। आसमान उनके जोशीले नारों से गूँजने लगा। वे आवेग से भरकर कह रहे थे-‘‘आखिर हम भी इनसान हैं, हम पर ये अत्याचार किसलिए ? हमारे पास भी दो हाथ-पैर हैं। हमारे मन में भी उमंगें हैं। हम जो चाहें, वह कर सकते हैं। हम कुत्तों की मौत मरने के लिए हरगिज तैयार नहीं। हम अत्याचार नहीं सहेंगे और अपना अधिकार प्राप्त करके रहेंगे।’’इन जोशीले नारों से धनी लोगों की नींद उड़ गई। भला वे यह बात कैसे स्वीकार कर सकते थे कि दास लोग खुल्लम-खुल्ला विद्रोह कर दें और अपनी आजादी की माँग करने लगे। उन्हें यह भी पता था कि ईसप ही उनका नेता है। आखिर सब धनवानों ने मिलकर ईसप को कैद कर लिया। उसे भयानक यातनाएँ दी गई। गरम लोहे से उसके पूरे शरीर को दागा गया। लेकिन ईसप शांत था। वह चुपचाप होठ भीचें अत्याचारों को सह रहा था। उसका मन कह रहा था कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया। आखिर हर आदमी को जिसने इस धरती पर जन्म लिया है, आजादी से जीने का हक है।तरह-तरह से सताने और मारने-पीटने के बाद ईसप को अब एक अँधेरी काल-कोठरी में डाल दिया गया, जहाँ धूप, हवा, रोशनी तक उसके पास नहीं आ सकती थी। वह मन-ही-मन घुटता रहता था। पिंजरे में डाले गए शेर की तरह मन-ही-मन छटपटाता रहता था। जमीन पर सिर पटक-पटककर बेहोश हो जाता।इसी तरह एक-एक कर कितने ही साल गुजर गए। ईसप को अब साल, महीने तो क्या याद रहते ! वह तो दिन और रात का अंतर करना ही भूल गया, क्योंकि उसकी अँधेरी कोठरी में तो हमेशा रात ही रहती थी। न उसे गरमी, जाड़े, बरसात का पता चलता था और न मौसम के बदलने का। धीरे-धीरे इतने साल गुजर गए कि ईसप बूढ़ा हो गया। यहाँ तक कि उसके घर के लोग भी उसे भूल गए।धनी लोगों ने जब देखा कि ईसप अब दीन-हीन बूढ़ा और लाचार हो गया है तो उन्होंने दया करके उसे काल-कोठरी से मुक्त कर दिया।ईसप जब काल कोठरी से बाहर आया तो बहुत कमजोर हो चुका था। यह अंदाज लगा पाना ही मुश्किल था कि इस आदमी में कभी इतनी ताकत थी कि इसने दासों में विद्रोह की भावना पैदा कर दी थी और धनी व शक्तिशाली लोग इसके कारण थर-थर कांपते थे। लेकिन अब ईसप की कमर झुककर तीर-कमान हो गई थी। आँखों से कुछ दिखाई नहीं देता था। कान बहरे हो गए थे। सिर पर उलझी जटाएँ थीं। दाढ़ी सफेद हो चुकी थी।ईसप के साथी ही अब उसे देखकर दूर भाग जाते थे। उन्हें डर था कि ईसप के साथ देख लिए जाने पर अब भी धनवान लोग उन पर अत्याचार करेंगे। इसलिए ईसप अब भीख माँगने को मजबूर हो गया। वह घर-घर जाता, बच्चों को दुआएँ देता, आशीर्वाद देता और भीख माँगता। कभी-कभी वह कहानियाँ भी सुनाया करता था। इसलिए बच्चे उसे देखकर दूर से दौड़े चले आते थे। दूर से ही चिल्लाकर कहते-‘‘बाबा, कहानी सुनाओ, कोई नई कहानी !’’ईसप उन्हें नई-से-नई कहानियाँ गढ़कर सुनाया करता। वे कहानियाँ ऐसी थीं जिन्हें सुनकर बच्चे खो जाया करते थे। जिन्हें सुनकर कभी वे रोते, कभी हँसते और कभी गुस्से से भर जाया करते थे, क्योंकि ये कहानियाँ उन्हें अन्याय का विरोध करना सिखाती थीं। इनमें जीवन के बड़े-बड़े सत्य छिपे थे। बाबा ईसप ने मानो अपने सारे जीवन के अनुभवों का सार इनमें निचोड़कर रख दिया था। इसीलिए इन कहानियों का असर बिलकुल जादू जैसा होता था। जो एक बार सुन लेता, वह इन कहानियों को कभी भूल ही न पाता।इसलिए बाबा ईसप द्वारा बच्चों को सुनाई गई ये कहानियाँ देखते-ही देखते घर-घर में फैलती चली गईं। पूरे यूनान में उनकी गूँज सुनाई देने लगी और फिर ये धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल गई। इन कहानियों में पशु-पक्षियों के जरिए बातें कही गई हैं; पर वे बातें इतनी बड़ी हैं कि जो भी सुनता है, देर तक सोचता ही रह जाता है। इसीलिए इन कहानियों का असर बहुत गहरा होता है।सच तो यह है कि ईसप अपने जीते-जी विद्रोह नहीं कर पाये , वह विद्रोह और परिवर्तन इन कहानियों के जरिए आया। देखते-ही-देखते समाज बदला। अब दास-प्रथा कहीं नहीं है। हाँ, ईसप की कहानियाँ आज भी हैं और वे हजारों सालों तक बनी रहेंगी, क्योंकि वे हमें एक सुंदर दुनिया गढ़ने की सीख देती हैं।
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